Speech by Pandit Jawaharlal Nehru, Prime Minister of India in FICCI's 21st AGM
The Honourable Pandit Jawaharlal Nehru (Prime Minister of India)
A Delegate requested that the Prime Minister's speech might be made in Hindustani.
Hindi Speech:
सभापतिजी और फेडरेशन के सदस्यो। मैं आपके हुक्म से यहां हाजिर हुआ हूं और मैंने आपके अध्यक्ष महोदय का लम्बा व्याख्यान सुना। इसमें आपने बहुत से सवालात किये हैं और बहुत सी बातों के ऊपर अपने ख़यालात का इजहार किया है। मैं जरा एक मुश्किल में पड गया हूं। एक तो यह कि अपनी कितनी कमजोरियों की वजह से और दूसरे आज मेरी तबीयत भी कुछ अलील है। और फिर इतनी सारी चीजों पर बोलना भी आसान नहीं है। इसके अलावा ये मज़मून भी जिन पर आपने इशारे किये हैं ऐसे हैं जिसके ऊपर ५-७ दिन में असेम्बली में, पार्लियामेंट में मुबाहिसा होनेवाला है और इसलिये यह मुनासिब नहीं कि जब वहां बहस होगी तो मैं यहां कोई ऐसी बात आपसे कहूं जो एसेम्बली के बहस के खिलाफ जाय। लेकिन फिर बाज ऐसी मोटी बातें हैं जिसमें कोई बहस की गुंजाइश नहीं। जो हर मुल्क में मानी जा रही हैं और जिन पर अमल आज से नहीं कई वर्षों से हो रहा है।
आपने अपने व्याख्यान में यह फर्माया है कि हमें वाक़यात को ऐसे देखना चाहिये जैसे कि वे हैं: The world as it is and not as it should be. जैसी दुनिया है वैसे ही उसे देखना चाहिये न कि जैसी दुनिया होनी चाहिये। यह ठीक है कि जो कुछ हमारे सामने है उसे हम देखें और सही तौर पर देखें पर अगर हम यह न देखें कि कैसी दुनिया होनी चाहिये या हमें किस तरफ बढना है या किस तरफ हम न बढ़ें तो यह तो आपकी बात कोई मुनासिब बात नहीं मालूम होती। अगर आज़ हमें क़दम आगे बढाना है और हमें आगे देखना है कि हमें इस बात का ख़्याल करना पड़ेगा कि हम दुनिया को कैसा देखना चाहते हैं। हमें इन दोनों बातों को देखना है। हमें जिधर पहुंचना है उस तरफ हम कितने क़दम आ चुके हैं और कितने क़दम और उठायेंगे। अगर इस एक बात को हम भूल जांय तो ठोकर खाकर गिर जायेंगे। लेकिन एक और दूसरी बात है। अकसर लोग देखा करते हैं: The world as it was. दुनिया जैसी थी उस तरफ देखना। दुनिया जैसी है, जैसी होगी उसे देखना तो ठीक है पर दुनिया जैसी थी उधर ही अगर हमारी निगाह जमी रहे तो यह निहायत खतरनाक है। कभी कभी ऐसा मालूम होता है कि दुनिया जैसी थी वह ख़तम हो गई पर अगर उसी दुनिया की तरफ हमारी तवज्जह हो और हम अपने पिछले बडप्पन पर ही गौर करते रहें तो फिर हम आज की दुनिया को और कल की आनेवाली दुनिया को नहीं देख सकेंगे ।
वाक़यात यह हैं और सब से बड़ा वाक़या यह है कि हम एक इन्तेहा दर्ज के क्रान्तिकारी और इन्क़लाबी जमाने में से गुजर रहे हैं। अच्छी बुरी बातें हो रही हैं। आज जो हम और आप यहां बैठे हैं वह जानते हैं कि दुनिया में अजीब क़िस्म कि एक जद्दोजेहद हो रही है। फिर से इस वक्त लड़ाई के बादल चारों ओर गरज रहे हैं। मैं नहीं समझता कि एकाएक इस वक्त दुनिया, में कोई लड़ाई हो जायेगी और न यहां पर मैं आपको डराने की कोशिश कर रहा हूं। मेरा ख़्याल नहीं है कि अभी कोई लड़ाई हो जायेगीं, लेकिन वाक़यात यह है कि अजीब तेजी से दुनिया खतरे के रास्ते पर जा रही है और ऐसे खतरे के रास्ते पर कि आप अन्दाजा नहीं कर सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो हम ख़्याल नहीं कर सकते हैं कि कहां यह दुनिया पहुंचे। जाहिर है कि अगर लड़ाई हुई तो सारे आपके नक्शे जो आपने यहां पेश किये हैं या जो आपकी गवर्नमेन्ट ने बनाये हैं वे सब बेकार हो जायेंगे। अगर लड़ाई न भी छिडे तो भी एक दिमागी लड़ाई जारी रहती है।
आपने अपने एड्रेस में मुझसे यह सवाल किया कि प्रेजीडेन्ट ट्रुमेन ने जैसा कहा है उसके मुताबिक़ अमेरिका अगर लड़ाई की तैयारी में ज़्यादा ध्यान लगाये और अपने मुल्क में लड़ाई की तैयारियां शुरू कर दीं तो फिर हम वहां से केपिटल गुड्स कैसे लायेंगे। साफ जबाब है जहां से हमें मिले वहां से लायें अगर कहीं से नहीं मिले तो नहीं लायेंगे। अगर कहीं से मिलेंगे तो तलाश की जायेगी और जहां से भी मिलेगे वहां से लायेंगे और अगर कहीं से न मिले तो और पसीना बहाना पड़ेगा और मेहनत करनी पड़ेगी। हमें खुद जो कुछ भी करना पड़ेगा करेंगे, अपने हाथ पैर-चलाकर। वह जमाना आता जाता है जब कि हमें खुद अपने हाथ पैर और अपने बल बूते पर भरोसा करना पड़ेगा। मैं कभी भी इस ख़्याल का न था कि और मुल्कों से हमारा सम्बन्ध न हो, उनसे लेनेदेन न हो । और यह सही है कि हम दुनिया से अलग नहीं हो सकते। लेकिन वाक़यात यह हैं कि आजकल की दुनिया को देखते हुये अगर हम बहुत ज़्यादा भरोसा बाहर की दुनिया पर करेंगे तो न जाने किस वक्त ये हमको धोखा दे देवें। क्योंकि दुनिया का हाल आज ऐसा ही है इसलिये यह भी एक सोचने की बात है। इसलिये हमें दुनिया के और मुल्कों से मेलजोल का बरताव बरतते हुये भी उन पर ज़्यादा भरोसा नहीं करना चाहिये। भरोसा तो हमें अपने ऊपर रखना है। लिहाजा जो केपिटल गुड्स हमें बाहर के देशों से मिलेगा वह हम मंगायेंगे और नहीं मिलेगा तो इसी मुल्क में पैदा करने की कोशिश की जायेगी। गरज़ यह कि जो कुछ भी करना मुनासिब होगा वह इस बारे में करना होगा।
आजकल की दुनिया कि यह हालत है कि पता नहीं चलता कि क्या भविष्य में होनेवाला है। कल या परसों क्या ख़बर आये, क्योंकि दुनिया की हालत ऐसी है। इसलिये यह कहना कि दुनिया में सब नालायक हैं सब लडाकू हैं गलत है। आप लोग जो यहां बैठे हैं काफी समझदार और लायक़ आदमी हैं। और गालिबन दुनिया में ऐसे आदमी काफी हैं जो अपनी जिन्दगी आराम से बसर किया चाहते हैं। फिर भी दुनिया के लोग बार बार लड़ाई और तबाही का सामना करते हैं। दुनिया की जो आदत सैकड़ों वर्षों से बनी है वह एकदम हटाई नहीं जा सकती है। इसलिये बहुत होशियार रहना है और मुल्क में एका क़ायम रखना है। जो दिक्कतें हमारे सामने पेश हैं और वह बहुत सी हैं उनका हमें हल निकालना है ताकि यह जो हमारा नया राष्ट्र है मजबूत बने और यहां के सभी तबकों के रहने सहने का मयार बढे।
आपने अपने एड्रेस में यह भी जिक्र किया कि कमर्सियल और बिजनेस कम्युनिटी सहमी हुई है। कुछ घबराई हुई है। कुछ पारसाल जो टैक्सेशन की पालिसी आई थी उससे आपको शिकायत थी। लेकिन कुछ हस साल राहत मिली। टैक्सेशन उससे बेहतर हुआ। लेकिन इसी के साथ आपने अपनी तक़रीर की खतम करते हुये आखिरी हिस्से में कुछ यह भी बयान किया कि हिन्दुस्तान की इन्डस्ट्री की जिस क़दर तरक्की हुई है वह कमर्सियल और बिजनेस कम्युनिटी की दुरन्देशी और हिम्मत से हुई है। पर यह दोनों बातें मेल नहीं खाती हैं। दिल का थरथराना और घबराना और साथ ही हिम्मत। यह दोनों बातें साथ साथ कैसे चल सकती हैं।
मान लीजिये कि दोनों ही बातें हैं। आदमी में हिम्मत भी होती है कमजोरी भी होती है। तो हमें सोचना है कि आखिर में यह बीमारी क्या है? मैं कोई बड़ा डाक्टर नहीं हूं। आप देखें तो आपको मालूम होगा कि हिन्दुस्तान में पैदावार की कमी ही हुई। और यह एक बहुत अहम बात है। जाहिर है कि इस बीमारी के इलाज के लिये काफी गौर करना पड़ेगा। मसला काफी अहम है। और सवाल खाली इस बात का नहीं कि कितना ज़्यादा केपिटल गुड्स मंगाना है। क्योंकि हमें सोचना है कि पैदावार में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है तो इसकी क्या वजह है। आप कहते हैं कि कुछ भड़कानेवाले लोग लेबर को भड़का देते हैं। स्ट्राइक होते हैं, काम रुकता है और पैदावार में कमी होती है। यह सब बातें होती हैं। लेकिन इन सबको क़ाबू में कैसा लाया जाय ? धमकी से, डर से या समझाकर। भड़कानेवाले बुरे आदमी हैं, लेकिन वे किसी बुनियाद के सहारे चलते हैं। बात यह है कि इस वक्त एक फिजां ऐसी है। और यह दुनिया की बीमारी है जो लोगों के दिमाग में घुस रही है। एक दूसरे के रिश्ते के बीच एक खाई सी है और लोगों को शक भी होता है कि हमारे साथ इन्साफ नहीं हो रहा है तो फिर वे झगड़ा फिसाद करते हैं। दुनियाबी बात यह है कि सबके साथ इन्साफ हो। जहां कोई इतयिनान नहीं होता है वहां रन्जिश फैलती है और हर एक भड़कानेवाले की आवाज सुनी जाती है। टैक्सेशन का बोझ व्यापारियों पर बहुत भारी है। इस पर आपने अपने भाषण में यह भी जिक्र किया कि आप लोगों पर टैक्सेशन का बोझ बहुत अधिक है पर इस लड़ाई के जमाने में किस तरह से बाज लोगों ने नाजायज फायदा उठाया और करोडों, लाखों रुपये बनाये। यह बात आसानी से समझ में आनेवाली नहीं : हंसी : मैं मैथेमेटिक्स तो नहीं जानता पर जब टैक्सेशना १५ व १५॥ आने का लगा हो तो लोग हजारों करोडों कैसे बना सकते है। यह मामला कुछ टेढा सा नजर आता है और यह चीज इन्सान को हैरत में डालनेवाली है। : हंसी :
इसी सिलसिले में एक सवाल उठता है और आपने भी उठाया है। और वह है नेशनलाइजेशन का। आपके सामने जो गवर्नमेन्ट का नुक्तानिगाह है वह रखा गया है। इस बारे में सफाई हो जानी चाहिये कि मुल्क को मालूम हो जाय, आपको मालूम हो जाय कि सरकार की इस बारे में क्या नीति है और क्या पॉलिसी है। मैं यह मानता हूं कि आज आप में से हर एक आदमी के दिमाग में यह चीज क़ायम है कि क्या होगा क्या नहीं होगा। यह जरूरी है कि बात साफ हो जानी चाहिये। पर इस बात की सफाई हो तो कैसे हो। क्या इसके लिये कोई ऐसा वसूल बनाकर रख दिया जाये। क्या हमें पूरी तौर से सोशलिज़्म के सिद्धान्त पर अपना काम करना चाहिये। बात की सफाई इस तरह से नहीं हो सकती है। आजकल हिन्दुस्तान में एक इज़्म पकडा जाय यह अच्छी बात नहीं है। हमको सिद्धान्तों को समझना है और फिर उन पर चलने की कोशिश करना है। वाक़यात को देखना है। जो चीज जमाने की हालत को देखते हुये मुनासिब हो वही करनी चाहिये। यह मोटी बात है। इस वक्त न तो हमारे पास ताक़त है और न इतना सामान है कि किसी बड़े पैमोने पर हम हर एक चीज को नेशनलाइज़ करना शुरू कर दें।
चुनाचे हमें यह सोचना है कि हम किस चीज को नेशनलाईज करें और किस चीज को न करें। जाहिर है कि हिन्दुस्तान में आम फिजां ऐसी है कि सरकार कारोबार को अपने हाथ में ले। जहां तक कांग्रेस का सम्बन्ध है १७-१८ वर्ष पहले कराची कांग्रेस में यह बात कही गई थी कि जो बड़ी बड़ी इन्डस्ट्रियां हैं वह स्टेट के कब्जे में होनी चाहिये। कराची कांग्रेस की जो यह बात है सिध्दान्तों की बात है और इस सिद्धांत को एक दो मुल्कों को छोड़कर दुनिया के सभी 'मुल्क 'मानते हैं। लेकिन यह अभी कहां तक मुमकिन हो सकता है इसी चीज को हमें मद्देनजर रखना है। गरज यह कि हमारे सामने यह सवाल आता है कि फौरन कितनी चीजों को नेशनलाइज करें और कितनी को कुछ वक्त के बाद करें।
हमेशा के लिये इसकी जिम्मेदारी नहीं ली जा सकती है। लेकिन कमोबेश कहा जा सकता है कि मुल्क में प्राइवेट इन्टरप्राइज का जरूर एक हिस्सा रहेगा। उसके जरिये बहुत कुछ हुआ है और हो सकता है। आपने इशारा किया कि गवर्नमेन्ट के सामने दामोदर वैली, हाइड्रो - इलेक्ट्रिक पावर और क्या क्या स्कीमें हैं। हमारी गवर्नमेन्ट के सामने इस क़िस्म के रिजॉलूशन पेश हैं कि गवर्नमेन्ट के पास जो पैसा है उसको नये काम में लगाया जाय न कि किसी पुराने काम को सरकारी कब्जे में लिया जाय। जाहिर है और बेहतर है कि हम पुराने कामों को जो ऐसे हैं उनको सरकार के कब्जे में न लेकर नये कामों के बढाने में यह पैसा लगायें। लेकिन इसके लिये हमें तय करना पड़ेगा। क्योंकि इस वक्त हम सभी उद्योगधंधों को सरकारी कब्जे में, नहीं ला सकते हैं इसलिये हमें तय करना पड़ेगा कि बाज इन्डस्ट्रियां जो एक खास तरह की हैं उनको सरकारी कब्जे में लिया जाय। इसके लिये इन्डस्त्रियों को मोटे तौर पर ३ हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक तो ऐसी इन्डस्ट्रियां गिनी जांय जो कि डिफेन्स वगैरह की हैं और उनमें प्राइवेट इन्टरप्राइज का कोई दखल नहीं होना चाहिये। दूसरी वे इन्डस्ट्री हैं जो कुछ वक्त के बाद धीरे धीरे सरकार के कब्जे में लाई जांय और तीसरे वे इन्डस्ट्री हैं जो पूरे तौर पर प्राइवेट इन्टरप्राइज के हाथ में रहें। फिर यह भी सवाल पैदा होता कि दूसरे क़िस्म की जो इन्डस्ट्रियां हैं उन पर प्राइवेट इन्टरप्राइज का दखल नहीं होना चाहिये। पर हमारी सरकार की जो ताक़त है और उसके पास जो साधन हैं उनसे हम नया काम खोलना चाहते हैं और उसे हम नई इन्टरप्राइज में लगाना चाहते हैं बजाय इसके कि पुराने के। हमारे सामने देश की बेहतरी की बड़ी बड़ी योजनायें हैं। जाहिर है कि सरकार की तबज्जह इन नये कामों को हाथ में लेने की तरफ ही होनी चाहिये। पैदावार के तरीके भी काफी तेजी से बढ रहे हैं और नये नये साधनों से नये नये तरीक़ों से पैदावार होने लगी है। ऐसी हालत में सरकार को पुराने ढंग से चलनेवाली इन्डस्ट्रीयों को ले लेने की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिये। बेहतर यही होगा कि सरकार अपना ध्यान सिर्फ नये कामों के बढ़ावा देने में लगाये । इसके अलावा अगर कोई इन्डस्ट्री नेशनलाइज हो जाती है उसे भी मैं समझता हूं कि जहां तक हो सके प्राइवेट बिजनेस के ढंग से चलाने की कोशिश करनी चाहिये। 'इसके लिये कोई एक क़ानून बनाकर कारपोरेशन बनो दिया जाय और वह नेशनलाइज की हुई इन्डस्ट्री कारपोरेशन के ज़रिये बिजनेस ढंग से चलाई जानी चाहिये जिससे बिजनेस उतने ही अच्छे ढंग से हो सकें जैसा कि प्राइवेट इन्टरप्राइज में होता है। यह काम डिपार्टमेन्ट को सोंपने में उतना अच्छा शायद नहीं हो सकेगा ।
मुझे खुशी हुई आपकी इस तजबीज को सुनकर कि मिनिस्ट्री ऑफ़ इन्टरनेशनल एफेअर्स होनी चाहिये। मैं पूरी तौर से इससे मुत्तफिक्क़ नहीं हो सकता। हां, यह जरूरी है कि इस वक्त अलग अलग न होकर हम एक साथ सारी चीज ले चलें। हमारे सामने आपने जो यह चीज पेश की है उसके बारे में आप जानते हैं कि एक ज़रूरी काम होता है तो उसके लिये एक अलग मिनिस्ट्री - बनाई जाती है। एक मिनिस्टर मुकर्रर होता है इसके लिये। फिर फौरन सवाल पैदा होता है कि तलाश की जाय एक ऐसे मिनिस्टर की। फिर उसका एक सेक्रेटरी होना चाहिये। खास ओहदे का एक आदमी होना चाहिये। उसकी खास तनखाह होनी चाहिये। यह पक्की बात है कि 'वह खास आदमी होना चाहिये। उस सवाल पर उसकी क्या दिलचस्पी है। उस सवाल पर वह कितना हाबी है। क्योंकि जरूरी नहीं है कि ऐसा आदमी जल्दी मिल जाय। चूंनाचे उसकी तलाश करनी पड़ती है। उसके बाद एक डिपार्टमेन्टल सेक्रेटरी होना चाहिये। एक पूरा डिपार्टमेन्ट खोलने के लिये न जानें क्या क्या करना पड़ता है और कितने नये अफसर मुकर्रर करने पड़ते हैं। सरकार की बागडोर संभाले अब तक मुझे डेढ़ वर्ष हो गये पर यह काम मैं नहीं समझ पाया हूं। फिर एक सवाल आता है कि इतने आदमियों के कमरे कहां हैं? इस तरह आदमी तलाश करने पर मिल जाते हैं तो फिर सवाल पैदा होता है कि वे बैठे कहां? दो चार महीने गुज़र जाते हैं उनके लिये कमरे ढूंढने के लिये। फिर 'ज्वाइन्ट सेक्रेटरी चाहिये और एडीशनल सेक्रेटरी व डिप्टी सेक्रेटरी चाहिये और क्या क्या? हंसी कमरे भी मिल जाते हैं। तब वे बैठते हैं और तब कुछ वक्त गुजरने पर सोचते हैं कि कुछ काम भी करना चाहिये। इसमें काफी दिन गुजर जाते हैं
काम भी शुरू होता है। लेकिन पहले काम यह होता है कि और जो १५, २० मिनिस्टर् हैं उनसे क्या सम्बन्ध रहेगा क्योंकि सब एक दूसरे से जुड़े और मिले हैं। हमें उसका ख़्याल होता है। उसके काम का । इसी तरह दिन गुज़र जाते हैं दुनियाबी बातें तय करने में। फिर इस तरह जो नया डिपार्टमेंट खोला जाता है उसकी शाखायें इतनी फैलने लगती हैं किं जिस काम के लिये वह शुरू किया जाता है. वह काम छिप सा जाता है। बड़ा पेचीदा सवाल है। एक तरफ तो गवर्नमेन्ट का काम इतना बड़ा हो गया है कि वह नारों से उसूलों से नहीं चलता। दूसरे देश के बंटवारे से बहुत सी नई मुसीबतें हम पर आंई। जहां हज़ारों आदमी बेघरबार हो गये और उनके लिये रोजी का सिलसिला न रहा वहां तो एक ऐसी हालत हो जाती है कि रास्ता ढूंढना और काम करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। ऐसे लोगों को जो बंटवारे के कारण बरबाद हो गये हैं उनको सही रास्ते पर रखना निहायत मुश्किल हो जाता है। मेरे सामने अभी तक कोई सही सस्ता नजर नहीं आया।
इस १५ अगस्त के बाद हिन्दुस्तान में नई फिजां आई। क्या क्या अजीब अजीब मुसीबतें आई हिन्दुस्तान में। और शुक्र है कि हम उनके ऊपर हाबी आये और किसी क़दर हम कामयाब हुये। सरकार ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। लेकिन फिर भी वाक़यात यह हैं कि जो भी कुछ किया गया है वह बहूत नाकाफी हुआ। इसका अन्दाज आप जगह जगह की हालत को 'देखकर लगा सकते हैं.। आपकी दिल्ली शहर की, यहां की हालत ले लीजिये। दिल्ली हमारी राजधानी है। बड़ा शहर है। जो यहां की हालत हुई है उस पर कोई सन्तोष नहीं जाहिर किया जा सकता। रिफ्युजियों के बसाने की एक बड़ी जिम्मेदारी थी हमारे ऊपर। उस जिम्मेदारी को हम ठीक ढंग से नहीं निभा सके। जो खराबी मुल्क में हो उसकी जिम्मेदारी गवर्नमेन्ट की हमेशा होनी चाहिये। चाहे वह गवर्नमेन्ट आफ इन्डिया हो या कहीं की भी गवर्नमेन्ट हो । दिल्ली शहर की हालत इस वक्त क्या है? चांदनी चौक में क़तार बनी हुई है। सडक के किनारे किनारे स्टाल बना रखे हैं! थोड़ी सी चीजें बटोर कर अपनी गुजर बसर करने की लोग कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इसमें भी सड़क इस तरह भर गई है कि इधर से उधर चलने का रास्ता निकल सकना मुश्किल है। गंदगी भी हुई है। गरज यह कि हर तरह के मसले खड़े हो गये हैं। यह एक छोटी सी बात है। हम इसे हल नहीं कर सके हैं। इस वक्त एक तरह का क्राइसिस है। एक ऐसी क्राइसिस जिसे लड़ाई की सी क्राइसिस कहा जा सकता है। लड़ाई में बहस नहीं होती है। उस वक्त सबके सामने सवाल यह होता है कि लड़ाई जीतें कैसे? उस वक्त हर एक शख़्स चाहे वह मजदूर दर्जे का हो या किसी और दर्जे का सिर्फ देश की जीत का ही ख़्याल करता है। ऐसे वक्त में कोई और काम करने के लिये देश के बाशिन्दों का न ध्यान होता है और न वक्त ही। सभी एक धुन में हो जाते हैं। इसीको ख़्याल करते हुये मैं एक नतीजे पर पहुंच जाता हूं कि इस वक्त मुल्क को कान्स्क्रिप्शन की जरूरत है। फौजी कान्स्क्रिप्शन की नहीं। यह कान्स्क्रिप्शन काम करने के लिये एक मजदूर की तरह से काम करने के लिये। यह गौर करने की बात है हमारे लिये। जाहिर है कि ऐसे कान्स्क्रिप्शन में सभी को मुसीबतें पड़ती हैं कम या ज़्यादा ।
पाकिस्तान से जो लोग आये हैं। अजीब सी हालत है कि बहुत सारे उनमें से काम करते हैं और बहुत सारे ऐसे हैं जो काम उनके सामने रखा जाय या रखा गया उसे वे पसन्द नहीं करते हैं। तो यह तो गौर करने की बात है। हम कुछ इस तरह से सोशल वर्क के लिये कान्स्क्रिप्शन करें। इस तरह जिस आदमी को जहां कहें वहां वह रहे और जो काम करने को कहें वह करे। जो पैसेवाले थे वे क्या कहते हैं? वे चाहते हैं कि उनको ऐसा काम न मिले यह इस ढंग का काम-उन्होंने नहीं किया है। समझने की जरूरत है कि फौज में जो कान्स्क्रिप्ट होकर जाता है वह पहले ही कोई अफसर नहीं हो जाता। चुनाचे हमें इस ढंग से चलना है कि हर एक आदमी कुछ न कुछ अपना फर्ज अदा करे। अगर हम इस ढंग से चलें तो जरूर मुल्क ऊपर उठ सकता है। फर्ज यह है कि पूरी लगन से जो काम हमें करना है या हमें करने को दिया जाय उसे पूरा करें।
इसी तरह का एक दूसरा मसला भी हमारे सामने है। बाज लोग बड़ी बड़ी आलीशान इमारतों में आराम से रहते हैं और बाज लोगों के पास रहने के लिये कोई जगह नहीं है। सर्दी गर्मी से बचने के लिये छप्पर की भी छत नहीं है। बाज लोग महलों में रहते हैं। आजकल की दुनिया में इसकी बरदाश्त नहीं। यहां पर एक आदमी ३० कमरे के मकान में रहे और बाज लोगों के पास छत भी न हो यह बात अब चल जाय, आज चल जाय, कल चल जाय लेकिन परसों नहीं चलेगी। मुल्क की दौलत इस तरह से चन्द आदमियों के हाथ में रहे यह जायज नहीं। लेकिन साथ ही यह भी है कि जो मुल्क की दौलत है वह उतनी बढ़ सकती है जितना की लोग काम करें और उन अमीर आदमियों की जेब काटने से नहीं। बिना अधिक पैदाबार किये तो काम नहीं चल सकता। यह सब बातें सही हैं। लेकिन हमें ऐसा करना चाहिये जिससे लोग यह मससूस करें कि हर एक आदमी मुल्क के चलाने में कुछ न कुछ बोझ उठाता है। कुछ न कुछ शरीक़ होता है उस बोझे के उठाने में वह। यह सारा निहायत एक अहम सवाल है और यह सारा रिफ्यूजी प्राब्लेम के सिलसिले में आ जाता है। इसी नजरिये से हमें इस सवाल पर सोचना है। जाहिर है कि हिन्दुस्तान की गाड़ी नहीं चल सकती अगर आप पूरी तौर से उसमें मदद न करें। पूरी तरह से मदद करें महज इसलिये नहीं कि अपना पेट भरना है बल्कि देश का ख़्याल करके। इस बदलती हुई दुनिया को देखकर समझकर आप सलाह दें। पिछले ५ महीने में मैने आपसे पहले जिक्र किया कि हम पर जो मुसीबतें आई वह इन्तेहा दर्जे की थीं। अकसरियत का मामला अक्लियत का मामला हमारे बीच में जो है उस पर भी नये सिरे से ख़्याल करना है। पाकिस्तान हिन्दुस्तान में आपस में सरहद है। उसमें ड्युटी कस्टम वगैरह का सवाल भी आता है। मैं नहीं जानता कि इस बारे में जो बातचीत हो रही है दोनों सरकारों में उसका क्या हश्र होगा। मेरी निजी राय यह है कि कोई न कोई जल्दी जल्दी ऐसा जमाना आना चाहिये जब कि इस तरह की सरहदें खतम हो जायेंगी। इसके अलावा मुल्क को बहुत ज़्यादा इससे नुक़सान होता है और हो रहा है। जो शख़्स इधर से उधर जाते हैं उनकी तलाशी ली जाती है। यह सब इन्तेहा दर्जे की मुसीबत की चीज हो गई है। हम जितनी जल्दी यह चीज हटा सकें अच्छा है।
आपने जिक्र किया कि हिन्दुस्तान में इधर उधर सामान भेजने में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिये। सूबे या रियासतो में। मैं समझता हूं कि जितना ज़्यादा मुल्क में फ्री मूवमेन्ट हो सके वह ठीक है।
हमने एक खतरनाक नतीजा देखा कम्युनलिज़्म का। इस कम्युनलिज़्म ने बढ़ते बढ़ते हमारे मुल्क के दो टुकडे कर दिये। इसके बाद हम लोग सोचें इसी जज़्बात ने महात्मा गान्धी की हत्या की और उसके बाद आरवीर में एक अजीब नक़्शा हमें दिखाया। लेकिन आखिर में हमने उस हालत पर काबू पाया और कम्युनलिज़्म को ख़तम करने का इरादा पक्का किया। हमारी कोशिशें जारी रहीं और मैं उम्मीद करता हूं कि तब तक यह कोशिश जारी रहेगी जब तक कि यह चीज हिन्दुस्तान में बिलकुल खतम न कर दी जाय। इससे भी खतरनाक चीज प्राविन्शलिज़्म की नजर आ रही है। हर सूबे के लोग अपनी अपनी अलग नीति बनायें और नये रोड़े पैदा करें। जैसा चाहें वैसी पाबन्दी तिजारत पर करें यह सब ठीक नहीं। क्योंकि अगर यह चीज चली तो बजाय इसके कि हम कोई युनाइटेड इन्डिया बना सकें वह महज नाम के लिये युनाइटेड इन्डिया होगा। मैं काफी इस सिलसिले में परेशान हो रहा हूं। यह सवाल ऐसा ही है। लेकिन साथ में यह एक चीज है जिसे देखकर भरोसा होता है। वह यह है कि प्रान्त की सरकारें इन्डियन नेशनल कांग्रेस से बंधी हैं। हर सूबे में कांग्रेस की हुकूमत बन गई है। इससे सब मिलकर एक साथ काम करते है। पर इस पर भी इस बढ़े और बढ़ते हुए खतरे का मुक़ाबिला करना चाहिये, समझाबुझाकर कोई जबरदस्ती से नहीं।
इस सबब से अगर हम अपनी इन्डस्ट्री को बढ़ायें तो हम उस समय तक जब तक कि अपने दिमाग़ में कोई ठीक सा नक़्शा न बनायें उस वक्त तक साफ तोर से कोई चीज़ बन नहीं सकती। अगर अलग अलग सूबे अपनी इन्डस्ट्री बढ़ायेंगे तो एक ही इन्डस्ट्री में कशमकश होगी। इसके लिये सेन्ट्रलाइजेशन की जरूरत होगी। इसलिये यह जो प्राविन्शलिज़्म का सिलसिला है, जो बढता जाता है निहायत खतरनाक है।
(At the request of another Delegate, the Honourable Pandit Jawaharlal Nehru delivered the rest of his speech in English)
There are one or two things. One is this. I have long thought as a Congressman that cottage industries should be developed, and I have never considered them as something opposed to large-scale industries. In the present context of things I am quite convinced that, apart from the long-distance programme of industrial development, the only way of meeting the present crisis is the immediate development of cottage industries. I think so quite independently of my Congress background. The question as to the difficulty in getting capital goods, wherefrom capital goods will come, whether America will now send them to us, etc. should not stand in our way. Obviously, we should try to get them from where we can. But we must begin to think of using our existing resources to the utmost. Take for instance the housing difficulties in Delhi. Now, some Departments work like that - that is, they speak of the shortage of steel and cement; and because steel and cement are not available, therefore nothing is done. I do not think that is a good enough approach. If there is insufficiency of steel and cement, there is quite enough earth here and mud-houses can be put up for people to live in, including for high officials of Government. Not only this. Something must be done in the same way in regard to industrial development. Our waiting for big machinery to come and for big schemes to develop is not a satisfactory approach. For, even if machinery comes, the big schemes take some years to develop. The only thing that can be done fairly quickly is something on a widespread cottage scale. You may use electric power or small machines if you like. I am not thinking in terms of machinery as an evil or anything like that. Nevertheless, we must try to develop production in a large way on a cottage scale. If we try to do that, it will improve matters very much, apart from the employment to considerable number of persons it will provide. In this way we should try to tackle these matters.
With regard to nationalisation I should like to say one thing. Whether any particular industry is nationalised or is run as a semi-State corporation, it should function on the lines, if you like, of private business, that is to say, not on a departmental level - I do not like the departmental way of carrying on business so that it will approximate to the same way of carrying on business as any efficient private businessman will do.
Lastly, you said something about South-East Asia. Surely, it is not necessary for you to ask me or my government to take interest in Indians in Burma or Indians overseas anywhere else. It is our duty; we intend, and we are trying to do our utmost for them. But there are two difficulties. One is that we are dealing with independent units and the question arises whether Indians there are nationals of that country or are aliens. We are apt to think too much of the old state of affairs so that we consider these subjects on the old lines. We appealed to the India Office and Colonial Office to protect the interests of Indians there. Indians in these places have to choose whether they will be nationals of the country they are residing in or not. The second difficulty is this. If the Governments in the various places bring any discriminatory legislation against Indians in particular we can oppose such legislation. But where it is equally applicable to all the people there, it becomes a little more difficult for us to protest against that, although in effect it may injure our people more than the others. Suppose there is a measure which makes a change in their social structure. How are we to come in the way of their changing it simply because in that process something happens to our disadvantage? It is a difficult problem. Anyhow it is up to us to do our utmost to protect the interests of Indians overseas.
In regard to South-East Asia, if we forget for a moment our present difficulties, I think the South-East Asia region is going to develop a close co-operation with India, because everything points to that-close economic relations and also geographical and strategic. In fact the Indian Ocean region is so very nearly situated to, India that anything that happens in that region affects India and is affected by India. We cannot help it. Of course if India goes to pieces, then it is a different matter. But so long as India is a big running concern it will continue to play an important part in the region of South-East Asia. Now, I am not thinking in terms of India becoming the leader of South-East Asia. People with an Imperialist outlook talk like that. They may do so. There are Socialist and Communist ideas. But we must not think in terms of India sort of dominating the South-East Asia region but rather as co-operating with the other countries in the region in building-up a common sphere of action, economic and the rest. Our close association with these countries - Nepal, Ceylon, Malaya, Siam, Indonesia (I may not include Indo-China just at present) and so on will grow, not immediately, but it will grow. On the other side there is Pakistan. I do not know how far its association or co-operation with other countries will extend. I am not clear about that in my mind. But certainly, Pakistan obviously comes within this sphere both from the defence and also from the economic point of view. So that, in all the South and South-East Asia region some sort of economic grouping is likely to take place. Statesmen of countries bordering India and in India are thinking on these lines now. If we have our hands free from these troubles there are talks of war at present something on those lines will develop. The development of closer co-operation with South-East Asia is not meant to be a grouping against any other group. But groups with guilty conscience cannot think except in terms of injury to them or evil designs against them. It is quite inevitable that there should be this economic grouping for mutual advantages not for being directed against anybody but just for preserving our own freedom and for helping each other if we can. Ultimately in the South-East Asia group Australia and New Zealand will also find a place. Geographically they are bound to come into that group. It is not a racial idea, it is not a religious or any other idea, but it is essentially one based on geography which ultimately has a powerful influence on future policy.
Let me say something about the business community. I am not quite clear that we have marched on as successfully as we would have liked to. We have not. Whatever our virtues and failings may be, I invite you to point out our mistakes in a friendly way; or if you like in any other way. Naturally we want to help you. We may have to face difficulties. We want your goodwill and co-operation and we are prepared to extend our help and co-operation. It is only our duty to help all sections of the community. Thank you. Jai Hind. >